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Thursday, 1 March 2012

शादी की सालगिरह


शादी की सालगिरह पर इस साल हमने कहा इनसे ..

चलो अबके शादी की सालगिरह मनाएं
फिर नए वर वधु की तरह
संग घूमें सजें इतराएँ
यह रुके कुछ सोच कहते हैं
अरी अब तो चल रहे इम्तेहान बच्चों के
क्यों न हम सालगिरह अगले हफ्ते मनाएं?
इश्क हम दोनों किसी और दिन फरमायें ?

उफ़ तौबा ये इनका
किसी और दिन का नज़ारा
बीत गए दिन, घंटे
और पूरे लम्बे साल १८
जवानी में हम अपनी जवानी पर न इतराए
इनके इंतज़ार में दिन महीने गंवाए
कल कर लेंगे, अभी ज़रा ज़िन्दगी बना लें
अपना आज ठीक है, कल संवार लें
यही सुनते सुनते अब बूढ़े हो चले हैं
बच्चों की चिंता में ,बाल झड चले हैं
छरहरा बदन, अब हो गया पहाड़ है 
और चेहरे पर छा रही  उम्र की झाड है. 
अब कौनसे कल का करें हम इंतज़ार
अधेड़ उम्र के भी रह गए दिन चार!!

अब कैसे हम अपने इनको समझाएं
ज़रा यह बात आप ही हमें समझाएं !!

Monday, 5 September 2011

झूठ



न ही बोलें लोग तो अच्छा है
मीठा
न ही बोलें लोग तो अच्छा है
झूठ से
झूठमूठ की बनावटी मीठी बातों से
नफरत है हमें।

क्या छिपाना होता है,  जो झूठ का सहारा लेना पड़ता है?
झूठ के पाँव नहीं होते। 
और मुंह मे राम बगल मे छूरी .... अब बस !! 
और सहन कर सकते नहीं। 

Monday, 25 July 2011

Notice



"यहाँ पर चापलूसों और घूसखोरों का आना मना  है"

मेरी टेबल के ऊपर लगा बोर्ड यह कहता है.


Thursday, 2 June 2011

बड़े होना

खा रहे थे हम दोनों
बर्फ मलाई
अरे वही... अपनी आइसक्रीम .. और क्या
खाते खाते .. कुछ शरारत थी सूझी
हमें भी और तुम्हें भी.
तुमने अपनी orange  बार
झाटक से मेरी स्कूल शर्ट में डाली
और भाग खड़ी हुईं.

और मैंने... अपनी orange बार
उठा तुम्हारी शर्ट पर लिखा- ११ 
वही,  तुम्हारा नंबर
स्कूल टीम की टीशर्ट पर जो था.
दोनों कि कमीजें
बचपन के रंग में
दोस्ती के रंग में
उस Orange बार के रंग में
रंग नारंगी हो गयीं.
और हम
भागते हुए..हँसते हँसते घर पहुंचे.

माँ ने एक नज़र हम पर डाली,
और एक शर्ट पर..
लगाई हुड़क कर डांट
उफ़ इतनी घोड़ी हो गयी हो..
बचपन गया ही नहीं...
माँ क्या कहूं...
आज भी वैसी हूँ...
बचपन इतना हसीं था
कि ज़हन से जाता ही नहीं..
कहीं छिप कर रहता है..
और बीच बीच में...
बिन बताये,
आ जाता है..
पल दो पल को..
झलक दिखला ...भाग खड़ा होता है.
फिर बता जाता है
कि शायद बदली तो हूँ
पर कहीं बदली नहीं हूँ
कभी-कभी अपना वो बचपन
अपने बच्चों के बचपन
में दिख जाता है...

कई बार सोचती हूँ मां..
कि क्या ज़रूरी था
बड़े होना!!
पर जीवन का दौर ऐसा
हाँ... शायद ज़रूरी था
बड़े होना.

Wednesday, 1 June 2011

चावल के दाने



चावल के दाने ...
सफ़ेद..
शायद खुदा ने.. मोती दे दिए
स्वाद भरे, सेहत भरे.

छिपे हुए मोती,
खुरदुरे से खाल में
जिसे छील छील
हाथों में छाले पड़ जाएँ
और .. बीनते बीनते..
उँगलियों में दरारें

पर क्या ही यथार्थ है
कि जिन हाथों को
यह मेहनत नसीब होती है
हमारे देश में ..
उन्हें ही इन दानों के लिए
और न जाने क्या क्या
पापड़ बेलने पड़ते हैं!!

और हाँ, पापड पर याद आया..
सूखी रोटी और मिर्च प्याज़ से
गुज़ारा करने वाले हाथ
पापड़ बनाते तो हैं
पर खा पाने का चाव
पता नहीं ... कब नसीब से नसीब में आये.

और कहते हैं.. देश तरक्की पर है..
कुछ कोने.. कुछ सडकें, कुछ घर
पर झोपड़ियाँ, खपरैल, खेत खलिहान
शायद वहीँ के वहीँ.... सूखे... दरारों वाले!
यह इस बढ़ते हुए देश की विडम्बना है.

Monday, 28 February 2011

रस्सी-कूद


ज सुबह-सुबह...
आते-आते...
सूरज ने हमसे कहा
आओ खेलो...
हमने उसकी ओर देखा
और कहा... खेलें क्या
कहता है...
इतनी सारी किरणों की 
रस्सियाँ फेंक रहा हूँ
खेलती क्यों नहीं..
भुला गयी हो क्या
बचपन के खेल..

हम रुके
कुछ याद कर
हँसे
और वहीँ
खड़े-खड़े
रस्सी-कूद का खेल
सूरज के साथ
खेल कर आये!

सूरज आज...
हमें अपना दोस्त बना गया!
एक हलकी सी आवाज़ दे
बचपन की याद दिला गया!

Tuesday, 22 February 2011

प्यार


प्यार
लगावट
प्रणय
मोहब्बत
प्रेम
प्रीत

इन सब में पड़ना...
बहुत बड़ा सरदर्द.
बाहर से देखें.
"खतरा" "सावधान"
"Approach at your Own Risk."
सब लिखा तो हुआ है.

हाय रे मूरख इंसान!
पढ़-लिख गया ..
पर समझा नहीं !

Thursday, 3 February 2011

यह लाल रंग


मुझे इस लाल रंग से प्यार है।

और भी कई रंगों से प्यार है॥
पर यह प्यार का रंग...
इससे उन बाकी सब रंगों से
कहीं कहीं कहीं.... ज्यादा प्यार है... ।

मुझे.....इस लाल रंग से प्यार है !

Wednesday, 13 October 2010

विश्वास

कुछ लोगों के लिये..बाकी लोगों पर विश्वास करना बहुत मुश्किल होता है... क्यों?
कुछ लोगों के लिये तथाकहित "अपनों" पर विश्वास कर पाना कठिन ... पता नहीं क्यों।

क्यों बाँध लेते हैं हम अपने मनों को.... झूठे धागों से?
मकड़ी के जाल से चिपकू, बिजली के तारों से खतरनाक ऐसे विचारों से ?

Tuesday, 21 September 2010

स्वादिष्ट लोग

कुछ लोग बड़े स्वादिष्ट होते हैं और पौष्टिक भी।
बस...वो हमारी थाली में ना परोसे जायें... यही चाह रहती है।
कभी भी !!

Thursday, 10 June 2010

गलती


ज़िन्दगी का पूर्णविराम नहीं
उसे अल्पविराम बना
कुछ अच्छा नफीज़ सा
िखिए .....
ताकि पढने वाले
कुछ उस से सीख
अपने पन्ने रंगीन बनाने की
उम्मीद रख सकें।

Wednesday, 2 June 2010

पूर्णिमा

चलता है चाँद अपनी रफ़्तार से
पर अपनी पूर्णिमा
तो दोमाही है
कभी कभी
कतार में खड़े होने पर
नंबर आने पर
मिलती है।
राशन की लम्बी लाइन
और हमारा नंबर आते आते
खिड़की बंद भी हो जाती है ।

दिखाई देती है
चाँद की चांदनी
किसी बैंक के लाकर में
रखी चांदी की तरह ,
जिसे देखने के लिये
एक अपनी चाबी
एक किसी और की कुंजी
का इस्तेमाल करना पड़ता है
और बस
ज़रा सा देख,
झाड पोंछ
वापस रख दिया जाता है ।
हाँ कभी कभी शौकिया
इस चांदनी को
हम पहन भी लेते हैं
पर बस, कभी कभी!!
ऐसी ही है
हमारी पूर्णिमा की चांदनी !

Wednesday, 26 May 2010

चलो... चलें??

यह कहती हमेशा ही बेटी हमारी
माँ चलो... चलें॥

चाहती जो हर चीज़ वो
करवाना जो काम हो
बुनियाद उसकी हमेशा
चलो ... चलें??

चलते हैं साथ अभी तो ये बच्चे
और मांगे भी साथ अभी तक ये बच्चे
चाहे काम उन्हीं के आधे अधूरे
और पर्चे हजारों जो करने हो पूरे

वक़्त का वो मोड़ नज़र रहा है
जहाँ से सडकें मुड़ी जा रही हैं
जो चलती हैं साथ अब तक अभी तक
वो मंजिल अपनी बदल जा रही हैं

दीखता वो मोड़ हर लम्हा हर पल है
पर हम भी उसे देखते ही नहीं हैं
जो है सच जान कल की ही सच्चाई
हम ख्यालों में पीछे धकेले हुए हैं

ये राहें वहीँ है जो मुड कर कभी भी
अलग राह अपनी ले कर ही रहेंगी
आज फिर भी चले हैं बेटी के साथ हम
क्यों सुनें उसका - चलो..चलें???


चुप्पी तुम्हारी

लिखेंगे कहानी बे सर पैर की
करेंगे बातें हवाओं के सैर की
करेंगे चर्चे गर्मियों के दौर के
बनायेंगे बातें बच्चों के शोर की ।

कहेंगे सब आप जो कहती है दुनिया
वो नाहक सी बातें इधर उधर की
बुनेंगे कहानी बारिश और घन की
बातें बेमानी धरती गगन की

जुबां के ताले दिलों पे न डालें
कभी तो ये जाले लबों पे न डालें
कह भी दें जो कहना कभी तो
आ जायें इस सूने जहां में बहारें !!

Thursday, 29 April 2010

जी लिए ..


ज़िन्दगी जी लिए ...
कुछ ही पलों में
ख्यालों की चादर तान
पेड़ की छाँव तले
प्यार के कुँए के पास
प्याज़ और मिर्ची के साथ
रोटी चख
एक लोटा मीठा पानी पी
ज़िन्दगी जी लिए
बड़ी हसीन सी
एक पल की लम्बी ज़िन्दगी
हर लम्हा जी लिए !

Wednesday, 24 March 2010

क्यों चले गए

जाने कहाँ चले जाते हैं
बिना बताये लोग
छिपकर ..ढूँढो .... आवाज़ भी नहीं देते

फिर से छुपन-छिपाई का खेल
क्यों खेलते हो ?
या ये कोई नया तरीका है
हमें चिढाने का ??

Saturday, 20 March 2010

आजकल लोग ख़त नहीं लिखते

न कागज़ की महक
न शब्दों की बनावट
न हाथ की लिखावट में सिमटे आभास
न लफ़्ज़ों में छिपते टिमटिमाते अहसास
न आंसुओं के मोतियों से पिरोई हुई माला
न अरमानों की खुशबू से महकते शब्द
न आशाओं का कोई चमकता तारा
न लफ़्ज़ों की चादर लिपटे ठट्टा-मज़ाक ।

इन सब से मिले अरसे हो गए हैं
लिखे हुए खतों को पढ़े बरस हो गए हैं
इन्टरनेट को ज़माने में अहसास खो गए हैं
ख़त लिखने का नशा आदम भूल गए हैं
वो लिखना और इंतज़ार का सबब भूल गए हैं
शब्दों में छिपे शब्द ढूँढना भूल गए हैं
शब्दों पर उँगलियों फेर समझना भूल गए हैं
क्या कहें दोस्तों,
हम इंतज़ार करना न भूले
पर दोस्त हमारे,
ख़त लिखना भूल गए हैं !

Thursday, 11 March 2010

चढ़ता सूरज


सूरज फिर आ गया
अपने सातों घोड़ों पर चढ़
और धीरे धीरे
आसमान को अपना
गुलाम बना रहा है
सबको धमका रहा है ।

हर फूल हर पत्ता
हर पेड़ हर पौधा
अपने अपने घर से झाँक
खिड़कियाँ किवाड़ बंद कर रहा है
फूल-कलियों सब छुप लो
ये लुटेरा आ गया है ।

फिर मांगेगा
अपने हिस्से का
दाना पानी
फिर लूट ले जायेगा
जवान घास का
शोख रंग और जवानी ।

फिर उठा ले जायेगा
ओस की बूँद की चमक
फिर कर जायेगा घर खाली
फिर उसके डर से
इंसानों के
गले सूखेंगे ।

फिर पैरों तले
ज़मीन खिसकेगी
और आँखों के आगे
अँधियारा छाएगा
आदमी का दिल
और छोटा हो जायेगा ।

सूरज अपने रथ पर चढ़
आ ही गया है !!

Friday, 5 March 2010

चेहरे की लकीरें


चेहरे की लकीरें
कुछ अपनी कहानी कहती हैं
छोटी छोटी कई
कही अनकही निशानी
कुछ वक़्त की मार की
कुछ प्यार की बौछार की
कुछ बारिशों के मौसम की
कुछ ठहरे हुए सावन की
कुछ ढलते वक़्त की
कुछ उगते सूरज की
कुछ आशाओं के समय की
कुछ उदासी की थपक सी
हर एक निशानी
में छिपी इक कहानी ।

ज़िन्दगी की ये निशानियाँ
चेहरे की रंगत में देख
कोई गिला नहीं
सुकून है
जी है ज़िन्दगी हमने
कुछ अपने अंदाज़ में
बस इतना करम रहे
कि ऐसे ही जियें
कल भी जैसे आज ।

चेहरे की लकीरों में
इन्हीं निशानों में
अपना सच नज़र आता है
अपना कल नज़र आता है
अपना आज नज़र आता है !!

Monday, 8 February 2010

मुझे कुछ नहीं लिखना


कुछ नहीं कहना
कुछ नहीं सुनना
कुछ नहीं देखना
कुछ नहीं गुनना
रहने दो हमें
ऐसे ही
जब जीने की चाह होगी
खुद जाग जायेंगे
जी लेंगे
अभी बस
रहने दो