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Tuesday, 15 June 2010

मित्र

बचपन का इक मित्र हमारा
मिल जाता हर मोड़ पर हमसे
बात एक ही हर बार कर जाता
और दिल का दर्द बढाता
न न ऐसी बात नहीं है
दिल पर अब आघात नहीं है
सुनने के हो गए है आदी
उम्र अब कट गयी है आधी
पर अब भी वो बात है कहता
बचपन में जिससे छेड़ा करता
अब - जब भी वो बात है करता
बचपन का अहसास है रहता ॥
"तब करती थी तुम दो चोटी
पर तब भी तुम थीं तो मोटी ! "
कहता है "अब भी हो मोटी
बदली नहीं जबसे थी छोटी
कुछ तो अपना size निहारो
Weighing Scale को ज़रा उबारो
तुम अब भी मोटी हो "मोटी"!!"
ऐसे पागल मित्र हमारे ... न जाने क्यों लगे हैं प्यारे !

Monday, 5 April 2010

हाय रे... कहाँ गए वो दिन!!


नज़रों की ताकत ढलने लगी है
यौवन की बौछार ढलने लगी है
मोटापे की चादर चढ़ने लगी है
समझा करो जानम
इशारों की भाषा
हुस्न ही नहीं
साथ ही
तुम्हारी उम्र भी ढलने लगी है !

वो कहते थे हमको
जान जो अपनी
आँखों पे चश्मा
अब मोटा पहनते
जो होठों की लाली के गाते थे नगमे
वो अब मीठे से
परहेज़ है करते
समझो तो समझो
न समझो तो क्या हो
समझा करो जानम इशारों की भाषा
हुस्न ही नहीं
साथ ही
तुम्हारी उम्र भी ढलने लगी है !

वो चलती थी सीटी
जब चलते थे हम भी
वो सीटी अब फी फी बजने लगी है
जो कसते थे फबते
जब गुज़रा करते थे
अब वो भी जर्जर
करते हैं खौं-खौं
हम भी थर थर
बदलते हैं रस्ता
ये ज़िन्दगी की
कौनसी सीढ़ी है
समझा करो जानम इशारों की भाषा
अरे बाबा
तुम्हारी उम्र अब ढलने लगी है !!!

Monday, 25 January 2010

एक और प्रेम विवाह

एक और प्रेम विवाह
हम देख आये
वर वधु को आशीर्वाद
भी जी भर दे आये
नाच लिए
गा लिए
ढेरों पकवान खा लिए
हंसी-ठट्टा खूब कर लिया
जेवर कपडा लत्ता
मन भर पहन लिया
ठण्ड खूब पड़ रही थी
कंपकपी छूट रही थी
पर हम भी पंजाबी ठहरे
व्याह है कह डटे रहे
खाने पीने में न करी कोई कोताही
हो हुल्लड़ मचाने में
हमसे पीछे दुनिया सारी ।

अब चुप चाप बैठ
वो दिन गुण रहे हैं
उफ़ हाय
यह न खा पाए
अरे वो छूट गया
सोच सोच मलाल कर रहे हैं
अजीब हैं हम सब
भाई बंधू हम सारे
ब्याह कराने गए
कि खाने भर के
रिश्तेदार हैं हम सारे
गए खाए गए आये
ऐसे हालात तो न थे हमारे ।

काम भी तो पूरी लगन
से कर के आये हैं
बहन जो ब्याहनी थी
दूल्हे मियां के नखरे न सही
जूते तो उठाने थे
हवन के लिए
घी तो बटोरना था
द्वार रोकना
मेहंदी लगवाना
चाय नाश्ता
हम ने ही तो करवाया
वो न बताएँगे
कि कितना किया
कितना करवाया
बस पूरी मुस्तैदी से
काम कर आये हैं
सारे रिश्तेदारों को
हंसी ख़ुशी विदा कर के आये हैं ।

दुल्हन टिकी रहे ससुराल में
इंतज़ाम कर के आये हैं
दुल्हे मियां बच के रहे
दुल्हन सुन्दर बड़ी है
उनके दिल की चाबी
दुल्हन के पास पड़ी हैं
एक नज़र के इशारे से
घायल हो जायेंगे
और हमारी बहन के हुस्न के
कायल हो जायेंगे
गुण भी उसके बहुतेरे हैं
तभी तो दुल्हे मियां
उसके इर्द गिर्द
लट्टू बने फिरे हैं!!

Tuesday, 19 January 2010

उफ़ हाय!!

गरचे कभी धुप सताएगी तुम्हें
तो मैं तुम्हें छाँव दूँगा ,
बारिश के पड़े थपेड़े
तो छत दूंगा ...
हवाएं करें तंग अगर जब जब तुम्हें
तो उन्हें रोक दूंगा
ऐसा कहा था कभी
किसी ने सड़क के मोड़ पर ॥

हम करते रहे इंतज़ार
वही किनारे किनारे
वो भी बड़े खूब निकले
बातों के सहारे
निकल लिये;
काम था उनका
कर गए ...
आज सब जो उन्होंने कहा
दिया है , और
ये Bus Shelter
उन PWD बाबू की इनायत से ही बना है !!