Monday, 8 February 2010

फूलों की ज़ुबान


फूलों की भी तो अपनी कहानी होती होगी
कुछ हसरतें कुछ ज़ुबानी होती होगी
सुनने वालों सुन लिया करो उन्हें भी
जो कह नहीं पाते
महकते महकते, खिलते रहते हैं
चुप्पी साधे,
हर सुबह, हर शाम
राहें तुम्हारी सुन्दर बनाते हैं
उन फूलों की बोली तुम्हें भी तो
कुछ कहती होगी !

मुझे कुछ नहीं लिखना


कुछ नहीं कहना
कुछ नहीं सुनना
कुछ नहीं देखना
कुछ नहीं गुनना
रहने दो हमें
ऐसे ही
जब जीने की चाह होगी
खुद जाग जायेंगे
जी लेंगे
अभी बस
रहने दो

Surprise Surprise!

Sometimes your reactions to situations surprise you too!
Where was this person lurking inside me?
Why?
Why Now?
Who is it!!

Questions Questions !