so like a change of garb, and season...
getting ready for the summer.
Saturday, 4 April 2009
Nitpicking.....

Ok...I get a kick out of picking
on things, people and ......issues....
Nitpicking that is called
or splitting hair.
Well, at this rate,
I will no longer have any hair to pick...
and MENTAL BALDNESS
is definitely not something
I look forward to.
God....Save me from myself.
(Actually, after typing in that...I clicked on the SAVE NOW button, and burst out laughing )
YOOO HOOOOO.
YOOO HOOOOO.
मैं ....
कभी-कभी लगता है कि मैं चातक हूँबारिश की एक-एक बूँद का इंतज़ार करती हूँ
मुंह उठाए , टकटकी लगा कर
बादलों को देखती रहती हूँ
कि अब तो बरसें
और बारिश की एक बूँद के पड़ते ही
झूम जाती हूँ ।
कभी लगता है कि मैं सारस हूँ
एक टांग पर पानी में खड़े रह कर
तपस्या सी कर रही हूँ
शायद इश्वर की एक झलक तो मिले
और यह इंतज़ार ख़त्म हो ।
कभी लगता है कि मैं रात हूँ,
रोज़ चाँद के आने का इंतज़ार करती हूँ
और जब चाँद आता है ,
तो उसकी चांदनी में भीग जाती हूँ
और सुबह होते ही ,
ओस की एक बूँद बन
कभी फूलों, कभी पत्तों पर
कभी फूलों, कभी पत्तों पर
कभी कलियों , कभी घास पर
बिखर जाती हूँ ।
(हैवानियत के बहुत आसार नज़र आते हैं , इंसानियत के कम)
बहुत कम लगता है कि मैं इंसान भी हूँ
बहुत कम लगता है कि मैं इंसान भी हूँ
जो दूसरो का दर्द देख कर रुक जाती हूँ
और मदद करने के लिए हाथ बढाती हूँ
बहुत कम ॥
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